From FB, written by Mr Krishnaraj Rao

No reform can make Judiciary system pro people, like any other ‘pillars’ of democracy!!

भारत की न्यायपालिका एक अनियंत्रित शक्ति के रूप में काम कर रही है — न कि शासन की एक वैध और जिम्मेदार अंग के रूप में। न्यायपालिका के विभिन्न घटक एक साथ चिपके हुए हैं, और एक साथ देश पर अनियंत्रित हुकूमत चला रहे हैं। इस स्थिति में उसे संतुलित करना और जवाबदार ठहराना असंभव है।

मोटे तौर पर देखा जाय तो 19,000 न्यायाधीशों ने 127 करोड़ भारतीयों को बंधक बना रखा है, अपनी मनमानी और अक्सर गैर कानूनी निर्णय से । एक तरफ तीन लाख से अधिक आरोपी न्यायिक हिरासत में कई महीनों से, या वर्षों से, कैद हैं, और उन्हें सुनवाई नहीं मिल रही है — केवल तारिख पे तारिख। दुसरे तरफ 19,000 न्यायाधीश और एक लाख वकील हर साल चार से चेह महीनों की लंबा छुट्टियां लेकर इन कैदिओं को लगातार अनदेखा कर देते हैं। न्याय व्यवस्था से तकरीबन 10 से 15 करोड़ भारतवासी पीड़ित और परेशान हैं क्योंकि उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। उन्हें मिल रहे हैं सिर्फ तारिख पे तारीख ! न्याय कहाँ है?

सच तो यह है कि न्याय व्यवस्था हमारी सुविधा के लिए नहीं चलाई जा रही है। वह चलाई जा रही है सिर्फ न्यायाधीश और वकीलों की सुख-सुविधा, तरक्की और लाभ के लिए।

याद करिये, हमारे पूर्वजों ने ब्रिटिश शासन से आजादी हासिल करने के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया था। बहुत सारे लोगों को जेल भी जाना पड़ा था। आजादी के बाद भी कई आंदोलन हुए हैं, अनेक प्रकार के अत्याचार और उत्पीड़न के खिलाफ। अब ज़रूरी है कि विभिन्न क्षेत्रों के लोग देश भर में न्यायपालिका का बोलबाला तोड़ने के लिए फिर से एक साथ हों, और सविनय अवज्ञा (सिविल डिसओबेडिएंस) का आंदोलन करें।

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भारत की न्यायपालिका एक अनियंत्रित शक्ति के रूप में काम कर रही है -- न कि शासन की एक वैध और जिम्मेदार अंग के रूप में। न्यायपालिका के विभिन्न घटक एक साथ चिपके हुए हैं, और एक साथ देश पर अनियंत्रित हुकूमत चला रहे हैं। इस स्थिति में उसे संतुलित करना और जवाबदार ठहराना असंभव है।

मोटे तौर पर देखा जाय तो 19,000 न्यायाधीशों ने 127 करोड़ भारतीयों को बंधक बना रखा है, अपनी मनमानी और अक्सर गैर कानूनी निर्णय से । एक तरफ तीन लाख से अधिक आरोपी न्यायिक हिरासत में कई महीनों से, या वर्षों से, कैद हैं, और उन्हें सुनवाई नहीं मिल रही है -- केवल तारिख पे तारिख। दुसरे तरफ 19,000 न्यायाधीश और एक लाख वकील हर साल चार से चेह महीनों की लंबा छुट्टियां लेकर इन कैदिओं को लगातार अनदेखा कर देते हैं। न्याय व्यवस्था से तकरीबन 10 से 15 करोड़ भारतवासी पीड़ित और परेशान हैं क्योंकि उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। उन्हें मिल रहे हैं सिर्फ तारिख पे तारीख ! न्याय कहाँ है?

सच तो यह है कि न्याय व्यवस्था हमारी सुविधा के लिए नहीं चलाई जा रही है। वह चलाई जा रही है सिर्फ न्यायाधीश और वकीलों की सुख-सुविधा, तरक्की और लाभ के लिए।

याद करिये, हमारे पूर्वजों ने ब्रिटिश शासन से आजादी हासिल करने के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया था। बहुत सारे लोगों को जेल भी जाना पड़ा था। आजादी के बाद भी कई आंदोलन हुए हैं, अनेक प्रकार के अत्याचार और उत्पीड़न के खिलाफ। अब ज़रूरी है कि विभिन्न क्षेत्रों के लोग देश भर में न्यायपालिका का बोलबाला तोड़ने के लिए फिर से एक साथ हों, और सविनय अवज्ञा (सिविल डिसओबेडिएंस) का आंदोलन करें।
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