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सर्वहारा सर्वहारा
कोयला मज़दूरों व कर्मचारियों को 1948 से प्राप्त होने वाली विशेष सामाजिक सुरक्षा कोल माइंस प्रोविडेंट फंड (CMPF) और इससे लिंक्ड पेंशन पर मोदी सरकार हमला करने की तैयारी कर चुकी है। CMPF को खत्म करके इसे EPF में merge करने के लिए और इस तरह इसे पूरी तरह खत्म करने के लिए एक कमिटी भी बना दी गयी है। और तो और यह भी खबर है कि CMPF को अवश्यम्भावी भरी वित्तीय संकट से बचाने के नाम पर सरकार और पांचों सेंट्रल ट्रेड यूनियनों के बीच CMPF में मज़दूरों-कर्मचारियों के अंशदान को बढ़ाने (4 से 7 प्रतिशत) का भी समझौता हो गया है। इसका यह अर्थ है कि अब बढ़ा हुआ अंशदान तो देना ही होगा, CMPF भी नजिं रह जाएगा और EPF में merger के बाद ( एक आकलन के अनुसार रिटायरमेंट के बाद मिलने वाला) न्यूनतम पेंशन भी एक तिहाई हो जायेगा। यह सब होने बाद इसके खिलाफ वाम यूनियनों ने संघ से जुड़े बीएमएस की अगुआई में 19-21 जून तक तीन दिवसीय कोल् हड़ताल का आह्वान किया है। ज्यादा उम्मीद है हड़ताल के नाम पर मज़दूरों को ये ट्रेड यनियन एक बार फिर से इनकी पीठ में छुरा भोंकने का काम हीं करेंगे। वैसे भी जिस लड़ाई की अगुआई बीएमएस जैसा फासिस्ट विचारों से जुड़ा संगठन करे, उस आंदोलन क्या हश्र होगा हम समझ सकते हैं। अंशदान बढ़ाने वाले समझौते को देखें तो एक गद्दारी भरी कार्रवाई तो ये इसमें कर चुके हैं। अब ये CMPF को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं या इसके विरुद्ध मज़दूरों के अंदर उबाल मार रहे आक्रोश को मिटटी में मिलाने की तैयारी कर रहे हैं, यह इनके इतिहास में किये कारनामे से समझा जा सकता है। इनका और खास कर बीएमएस का तो यही इतिहास रहा है कि जब मज़दूर का मूड लड़ाई का रहे तो बीच मैदान से भाग जाना और एक मामूली से मामूली सरकारी आश्वासन पर मज़दूर आंदोलन के साथ गद्दारी करना इनकी फितरत रही है। वे मज़दूरों के मनोबल को इस बार भी तोड़ने की कोशिश करेंगे। देश स्तर पर किसी और के द्वारा हड़ताल का कॉल नहीं दे पाने की स्थिति का ये यूनियन फायदा उठाते हुए सरकार को मज़दूर विरोधी कानूनों और फैसलों को लागू करने में मदद पहुंचाते रहे हैं। कोल मज़दूरों के इस बार के आक्रोश को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि इन यूनियनों के हाथ-पैर फुले हुए हुए हैं। इन्हें लग रहा है कि हड़ताल के इनके कॉल को, जो महज़ एक खानापूर्ति है और अपनी गद्दारी को छुपाने के लिए की गयी कार्रवाई अधिक है, अगर मज़दूर सच में ले लेते हैं और वास्तविक संघर्ष में उतर जाते हैं तो इनकी पूरी योजना की कलई खुल जाएगी। साथियों, यही जमीनी परिस्थिति है जो एक दुष्चक्र से कुछ भी कम नहीं हैं। CMPF को खत्म करने को लेकर कोयला मज़दूरों में काफी आक्रोश है, लेकिन सवाल है इससे होगा क्या, जब तक कि मज़दूरों का कोई नया और सच्चा संघर्षकामी केंद्र देश स्तर पर सामने नहीं आ पाता है!? आज आगे बढे हुए मज़दूरों को ही नहीं, व्यापक मज़दूरों को इस विकट परिस्थिति पर विचार करना चाहिए और इससे बाहर निकलने का रास्ता बनाने पर गम्भीरता से लगना चाहिए। अन्यथा, जो हो रहा है उस पर महज़ आक्रोश व्यक्त करने के अतिरिक्त और कुछ करना असंभव है और असम्भव ही बना रहेगा।
(सुधारवाद का विरोध करें, क्रांति का रास्ता ही प्रताड़ित और शोषित सर्वहारा वर्ग के मुक्ति का एकमात्र रास्ता है! #Socialism)

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