फासीवाद का कोल माइंस प्रोविडेंट फंड (CMPF) पर हमला!

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सर्वहारा सर्वहारा
कोयला मज़दूरों व कर्मचारियों को 1948 से प्राप्त होने वाली विशेष सामाजिक सुरक्षा कोल माइंस प्रोविडेंट फंड (CMPF) और इससे लिंक्ड पेंशन पर मोदी सरकार हमला करने की तैयारी कर चुकी है। CMPF को खत्म करके इसे EPF में merge करने के लिए और इस तरह इसे पूरी तरह खत्म करने के लिए एक कमिटी भी बना दी गयी है। और तो और यह भी खबर है कि CMPF को अवश्यम्भावी भरी वित्तीय संकट से बचाने के नाम पर सरकार और पांचों सेंट्रल ट्रेड यूनियनों के बीच CMPF में मज़दूरों-कर्मचारियों के अंशदान को बढ़ाने (4 से 7 प्रतिशत) का भी समझौता हो गया है। इसका यह अर्थ है कि अब बढ़ा हुआ अंशदान तो देना ही होगा, CMPF भी नजिं रह जाएगा और EPF में merger के बाद ( एक आकलन के अनुसार रिटायरमेंट के बाद मिलने वाला) न्यूनतम पेंशन भी एक तिहाई हो जायेगा। यह सब होने बाद इसके खिलाफ वाम यूनियनों ने संघ से जुड़े बीएमएस की अगुआई में 19-21 जून तक तीन दिवसीय कोल् हड़ताल का आह्वान किया है। ज्यादा उम्मीद है हड़ताल के नाम पर मज़दूरों को ये ट्रेड यनियन एक बार फिर से इनकी पीठ में छुरा भोंकने का काम हीं करेंगे। वैसे भी जिस लड़ाई की अगुआई बीएमएस जैसा फासिस्ट विचारों से जुड़ा संगठन करे, उस आंदोलन क्या हश्र होगा हम समझ सकते हैं। अंशदान बढ़ाने वाले समझौते को देखें तो एक गद्दारी भरी कार्रवाई तो ये इसमें कर चुके हैं। अब ये CMPF को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं या इसके विरुद्ध मज़दूरों के अंदर उबाल मार रहे आक्रोश को मिटटी में मिलाने की तैयारी कर रहे हैं, यह इनके इतिहास में किये कारनामे से समझा जा सकता है। इनका और खास कर बीएमएस का तो यही इतिहास रहा है कि जब मज़दूर का मूड लड़ाई का रहे तो बीच मैदान से भाग जाना और एक मामूली से मामूली सरकारी आश्वासन पर मज़दूर आंदोलन के साथ गद्दारी करना इनकी फितरत रही है। वे मज़दूरों के मनोबल को इस बार भी तोड़ने की कोशिश करेंगे। देश स्तर पर किसी और के द्वारा हड़ताल का कॉल नहीं दे पाने की स्थिति का ये यूनियन फायदा उठाते हुए सरकार को मज़दूर विरोधी कानूनों और फैसलों को लागू करने में मदद पहुंचाते रहे हैं। कोल मज़दूरों के इस बार के आक्रोश को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि इन यूनियनों के हाथ-पैर फुले हुए हुए हैं। इन्हें लग रहा है कि हड़ताल के इनके कॉल को, जो महज़ एक खानापूर्ति है और अपनी गद्दारी को छुपाने के लिए की गयी कार्रवाई अधिक है, अगर मज़दूर सच में ले लेते हैं और वास्तविक संघर्ष में उतर जाते हैं तो इनकी पूरी योजना की कलई खुल जाएगी। साथियों, यही जमीनी परिस्थिति है जो एक दुष्चक्र से कुछ भी कम नहीं हैं। CMPF को खत्म करने को लेकर कोयला मज़दूरों में काफी आक्रोश है, लेकिन सवाल है इससे होगा क्या, जब तक कि मज़दूरों का कोई नया और सच्चा संघर्षकामी केंद्र देश स्तर पर सामने नहीं आ पाता है!? आज आगे बढे हुए मज़दूरों को ही नहीं, व्यापक मज़दूरों को इस विकट परिस्थिति पर विचार करना चाहिए और इससे बाहर निकलने का रास्ता बनाने पर गम्भीरता से लगना चाहिए। अन्यथा, जो हो रहा है उस पर महज़ आक्रोश व्यक्त करने के अतिरिक्त और कुछ करना असंभव है और असम्भव ही बना रहेगा।
(सुधारवाद का विरोध करें, क्रांति का रास्ता ही प्रताड़ित और शोषित सर्वहारा वर्ग के मुक्ति का एकमात्र रास्ता है! #Socialism)

Soviet Victory over Fascism – join us tomorrow for memorial day

“It goes to the credit of Soviet socialism that within 3 years after such a devastating war, the Soviet economy had been restored to its pre-war level. And in the following 3 years, it had doubled in size.”
Long live proletarian revolution! Long live Socialist revolution!

Red Youth

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Join Red Youth and the CPGB-ML tomorrow (Tuesday 9 May) at the Soviet War Memorial to commemorate the heroic struggle of the soviet people and the sacrifice of 27 million lives in the fight against fascism. We will be meeting at the Soviet War Memorial in Geraldine Mary Harmsworth Park, Kennington, from 10:30am.

In this year, which marks the 100th anniversary of the October Revolution, it is as important as ever to remember and educate people about real, proletarian history. As Engels noted in Material for the History of Ireland in 1870: “The bourgeoisie turns everything into a commodity, hence also the writing of history. It is a part of its being, of its condition for existence, to falsify all goods; it falsified the writing of history. And the best-paid historiography is that which is falsified for the purposes of the bourgeoisie.”

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फासीवाद का बढ़ता कदम और क्रन्तिकारियों की रणनीति

मै पहले ही बता दूँ की यह लेख किसी क्रांतिकारी दल का मैनिफेस्टो या कार्यक्रम नहीं है. यह एक सोच है, आधार है मार्क्सवादी भगत सिंह और ऐतिहासिक द्वंदवादात्मक पद्धति, और उसपर आधारित आजतक के आर्थिक, राजनितिक, सामाजिक अनुभव. इसमे और जोड़ने की जरुरत है ताकि, आज का विश्लेषण समग्रता में कर सकें, क्रांति को सही रास्ते पर ला सकें.
भारतीय इतिहास भिन्न है यूरोप के इतिहास से, फिर भी एक समानता है. यूरोप और अमेरिका में जहाँ दासप्रथा था, भारत में जातिवादी प्रथा एक कोढ़ के रूप में पनपा, बड़ा हुआ और सड़कर समाज को दूषित कर रहा है. दोनों ही उत्पादन के तरीकों से सम्बन्ध रखते हैं और उसकी उपज हैं.
फिर पुरे विश्व में राजतन्त्र या सामंतवाद ने अपना कब्ज़ा किया. उत्पादन के साधन, मुख्य रूप से जमीन, पर स्वामित्व कायम किया और किसानों को उसपर काम करने का अवसर दिया लगान के बदले में! ध्यान रहे जमीन अभी भी सामाजिक था. भगवान या काल्पनिक शक्ति, जिसने ‘दुनिया और जीवन बनाया’, का महत्त्व बढ़ा और उसके आधार पर बने धर्म ने लाखों, करोड़ों इंसानों को मारा!
पूंजीवाद
फिर करीब 500 वर्षों पहले पूंजीवाद का आगमन हुआ और राजा/जमींदार-प्रजा/किसान का सम्बन्ध बदलकर पूंजीपति-मजदुर में तब्दील हो गया. उत्पादन क्षमता में अपार वृद्धि हुई और साथ ही साथ जहाँ नव निर्मित मजदुर वर्ग (जो पहले किसान थे, जमीन से जुड़े हुए थे, और अब सर्वहारा बन गए, जिनके पास अपने को जीवित रखने के लिए अपने श्रम को बेचने के आलावा और कोई श्रोत नहीं बचा) के शोषण में गुणात्मक वृद्धि हुआ, वही अकूत धन का निर्माण और उसका जमावड़ा कुछ के हाथों में हुआ. सैकड़ो और हजारों मजदुरों को एक साथ, एक शहर में रहने का मौका मिला, जाति, धर्म, रंग गौण हुआ और एक भाईचारा का जन्म हुआ, जो एक क्रांति का आधार बना!
मुनाफे के होड़ ने एकाधिकार पूंजीवाद को जन्म दिया, यानि स्वतन्त्र बाज़ार ख़त्म हुआ और खुले प्रतियोगिता के जगह तोड़-फोड़, युद्ध, आतंकवाद ने स्थान लिया. यहाँ तक की सरकार भी स्वतन्त्र नहीं रही, चाहे वह विकसित देश हो या अविकसित. अविकसित देशों के ऊपर केवल देश के पूंजीपतियों का ही हाथ नहीं बल्कि विदेशी पुंजियों का भी हस्तक्षेप साफ़ साफ दिखता है. विरोध करने पर हर तरीके के साधन का इस्तेमाल किया गया, ताकि ‘प्रजातान्त्रिक’ तरीके से चुने गए सरकार को गिराया जा सके, बदले में एक ‘गुलाम’ सरकर लाया जा सके, जरुरत पड़ने पर सेना का भी इस्तेमाल किया गया!
भारत
1992 से कौंग्रेस की ने ‘सुधार’ के नाम पर श्रम कानून और जमीन अधिकरण कानून को लाने की भरपूर कोशिश की. वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ के आदेशों का पालन मजबूती से होने लगा! बढ़ते जीडीपी से खुश देशी और विदेशी बुर्जुआ वर्ग ने मनमोहन सिंह की भरपूर तारीफ की, मिडिया ने राहुल गाँधी के तारीफ में भरपूर दासता दिखाई. एफडीआई और अमेरिकी हस्तक्षेप का विरोधी दलों ने विरोध किया पर दिखावे के लिए, जो अब साफ़ है; भाजपा सारे कॉंग्रेसी आर्थिक निति को ही अपना ही नहीं रही, बल्कि उसे त्वरित कर रही है. धर्म और देश एक मुखौटा है मिहनतकाश जनता के भारी शोषण को छुपाने के लिए, उसके एकताबद्ध विरोध को हासिये पर करने के लिए. सामंतवाद ने जो इस्तेमाल धर्म का किया था, उसे ख़त्म करने के बजाय, पूंजीवाद ने उसका पुनरुत्पादन और बृहद रूप में किया. वाम ने भी विरोध किया, काफी ‘सभ्यता’ दिखाई और विरोध सडकों पर जुलुस के रूप तक आया पर वर्ग संघर्ष के रूप में नहीं, मजदुर वर्ग को सत्ता से जोड़ने के रूप में नहीं, जो तेलंगाना या नक्सलबाड़ी में दिखा था.
बीच में अटल बिहारी वाजपेयी के नेत्रित्व में एनडीए सरकार बनी. जिसने इस ‘सुधार’ को आगे ही नहीं बल्कि त्वरित किया! जनता ने इसका भरपूर विरोध किया और कौंग्रेस सरकार वापस आई. यहाँ विश्व आर्थिक संकट का भी आगमन हुआ, जो 2008 में अमेरिका से शुरू हुआ. इस मंदी ने आजतक पीछा नहीं छोड़ा और विश्व पूंजीवाद आर्थिक उछाल की उम्मीद लगाये बैठा है.
अमेरिका और यूरोप के बुर्जुआ आर्थिक ‘विशेषग्य’ मार्क्स का ‘दास कैपिटल’ पढ़ रहे हैं. इस पुस्तक के बिक्री में जबरदस्त उछाल आया है;. पर उनक दुर्भाग्य, दास कैपिटल पूंजीवाद के अन्दुरुनी अंतर्द्वंद की चर्चा बखूबी करता है, पर उससे निजात के लिए समाजवाद की स्थापना की बात करता है. यानि पूंजी के रूप में आमूल परिवर्तन. निजी पूंजी के जगह सामाजिक धन की वकालत. केवल वितरण ही नहीं बल्कि उत्पादन के साधन पर कुछ पूंजीपतियों के जगह पुरे समाज का नियंत्रण! पूंजीवाद के विरोध को ध्वस्त करने के लिए मार्क्स सर्वहारा तानाशाही की वकालत जरुरत के रूप में करते हैं, जो फ्रार्न्स के क्रांति से निष्कर्ष के रूप में निकला था (और अब तो और सख्ती की जरुरत होगी, जो शिक्षा सोविअत रूस में पूंजीवाद की प्नार्स्थापना से हुई है)!
2014 का चुनाव
2012 तक जनता अपना धैर्य खो चुकी थी. ऊपर से कौंग्रेस प्रशाषण का अपराध, भ्रष्टाचार और जनता के दुखों के प्रति असंवेदनशीलता भी काफी हद तक सामने आ चूका था. भारतीय और विदेशी पूंजी भी मनमोहन सिंह के नेत्रित्व से असंतुष्ट थे. दोनों का असर एक अन्दोहालन के रूप में हुआ. यह जन लोकपाल आन्दोलन के नाम से प्रसिद्द हुआ. यह आन्दोलन कुछ हद तक स्वस्फूर्त भी था, फिर भी इसमे पूंजी के दलाल, चिन्तक, मिडिया और पैसे लगे हुए थे. यह आन्दोलन अन्ना हजारे के नेत्रित्व में हुआ और अंतत कौंग्रेस सरकार को मोदी सरकार ने हटाया. मोदी सरकार को लाने में एक सुनियोजित देशी, विदेशी पूंजी और मिडिया का हाथ था. आप ने भी कुछ सफलता हासिल की, पर उसकी कोशिश पूंजीवाद में सुधार तक ही सिमित थी. प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव जो पूंजीपतियों पर सरकारी नियंत्रण के पक्ष में थे, बाहर के रास्ते दिखाए गए, एक महज गैर प्रजन्त्रिक तरीके से.
हाल के 5 राज्यों के चुनाव में आप ने गोवा और पंजाब में चुनाव लडे, जहाँ उसे मुह की खानी पड़ी. दिल्ली के एमसीडी चुनाव में भाजपा के पैसे, मिडिया और लगातार आप के खिलाफ दुष्प्रचार ने आप को बुरी तरह हराया. धर्म और देशवाद ने तर्क का सत्यानाश कर दिया है. आप ने बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा में अच्छा काम किया था, पर दिल्ली की जनता ने उसे नकार दिया. यहाँ यह भी कहना गलत नहीं होगा की 1977 के आन्दोलन का मुख्य नारा या मुद्दा था, जनप्रतिनिधि को 5 साल से पहले बुलाने का अधिकार. यह मुद्दा प्रखर ना होने के बावजूद 2012 में छाया रहा. अब विपक्षी दल तो उसका नाम भी नहीं ले रहे हैं, योगेन्द्र यादव के कहने के बावजूद आप खामोश है, और अपनी बुर्जुआ मौकापरस्ती और लालच को ही प्रकट कर रही है, भले ही वह कश्मीर के पीडीपी और भाजपा की मिली जुली सरकार से कम मौकापरस्ती हो.
2014 से 2017 तक की कहानी
जी हाँ. कहानी ही तो है! बढ़ते फासीवाद की. इसका जन्म अचानक नहीं हुआ है. 1925 में जन्मी आरएसएस ने अंग्रेजों की खिदमत की, 1942 के आन्दोलन में अंग्रेजों का साथ दिया, इसके प्रमुख सावरकर ने अंग्रेजों से माफ़ी मांगी और काला पानी की सजा को ख़त्म करवाया. वाजपेयी ने भी देश छोडो आन्दोलन से अलग रहने का लिखित वचन दिया और जेल में जाने से बचे. 1947 में तिरंगा झंडा को जलाया. हाल तक अपने कार्यालयों में तिरंगा नहीं फहराया. शुरूआती दौर से ही मालिकों और पूंजीपतियों की खिदमत करना इसके संविधान में था. दूसरी ओर दलितों, अल्पसंख्यकों, औरतों, आदिवासियों और मजदूरों के प्रति घृणा भी इसकी खून में ही था. यह घोर दक्षिण पंथी दल इटली के फासीवादी दल से ही प्रेरणा लेता रहा है!
मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही 34 श्रम कानून ख़त्म कर दिए और साथ ही साथ संविधान में संधोशाधन कर अम्बानी के एफआईआर को निरस्त्र कर दिया.
स्वतंत्रता के बाद कौंग्रेस ने, नेहरु, पटेल आदि के नेत्रित्व में भारत को पूंजीवाद के रास्ते पर लाया. अम्बेडकर के नेत्रित्व में बना संविधान भी इसकी पुष्टि करता है. शुरुआती दौर में भातीय पूंजीवादी इतने सशक्त नहीं थे की वह खुद अपने पैरों पर खड़ा हो सके. नतीजा था ‘मिक्स्ड इकोनोमी’, जो कहीं से भी समाजवाद के रास्ते पर नहीं था, भगत सिंह (या उनके हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिअशन से, जिनके कमांडर चंद्रशेखर आज़ाद थे) के मजदुर राज्य से कहीं से भी करीब नहीं था! जब पूंजी की ताकत एक खास सीमा से अधिक बढ़ गयी और उसे राज्य के मातहत रहने की जरुरत नहीं रही, (विदेशी पूंजी को भी मदद लेने की जरुरत पड़ी ताकि देशी श्रोतों का भरपूर शोषण किया जा सके), तो शुरू हुआ ‘सुधार’ का दौर, जो आवश्यक रूप से पूंजी के मोटा होने के लिए किया जाता है, चाहे वह अमेरिका में हो या हमारे यहाँ या फिर, ग्रीस, फ़्रांस, चीन या रूस में.
फासीवाद हर जगह दिख रहा है, चाहे राज्य या इसके विभिन्न अंग में हो या समाज में. गौ रक्षक, हिन्दू सेना, बजरंग दल, आरएसएस आदि इसके अंग हैं, जिसे आज की सत्ता पैसे, पुलिस, अर्ध सेना, प्रशाषण आदि का संरक्षण है. मारुती उद्योग के मजदूरों और अपन्ग साईं बाबा को आजीवन कारावास भी बढती फासीवाद का ही एक उदहारण है. गाँव, कस्बों तक में यह दिख रहा है. अल्पसंख्यकों, दलितों को देखें. एक भय व्याप्त है. बेरोजगार की कमी, छिनते जमीन, सिकुड़ते जंगल जहां हजारों वर्षों से आदिवासी रह रहे थे, घटती क्रय शक्ति और ऊपर से फासीवाद के टूकडे पर पलने वालों का आक्रमण! शहर या गाँव में, जो उची जाति से हैं, मध्य वर्ग के हैं, उनके ऊपर यह भय अभी नहीं दिख रहा है, पर बकरे की अम्मा कबतक खैर मनाएगी? मझले और छोटे वर्गीय व्यापारियों को देखें. उनका भी सर्वहाराकरण हो रहा है. आखिर 7% से अधिक जीडीपी कहाँ जा रहा है?
इस बीच वित्त पूंजी का आकार बढ़ रहा है. सेंसेक्स अपना पुराना रिकॉर्ड तोड़ रहा है. पर क्या मजदुर वर्ग बढ़ रहा है? समाजवाद के खिलाफ कुँए के मेढक तर्क देते हैं की मध्यम वर्ग बड़ा हो रहा है, सर्वहारा क्रांति अब संभव नहीं है. चीन भी उदहारण है इनका, इस तर्क के समर्थन में. 2008 याद है ना? ज्यादा बड़ा आर्थिक गिरावट आहट दे रहा है. एक उदहारण देना आवश्यक है. तकरीबन 3 साल पहले 1% पूंजीपतियों, वित्तीय संस्थानों के पास भारत के उतने धन थे जो 48% भारतीय के पास थे, अब उसी 1% के पास उतना है, जो 53% के पास हैं! धन का संकेन्द्रीयकरन बढ़ रहा है. इस आंकड़े को विश्व स्तर पर भी देखा जा सकता है. 1 साल पहले करीब 68 लोगों के पास उतना था जितना आधे पृथ्वीवासी के पास, जो अब 8 लोगों के पास है. माध्यम वर्ग भले ही बढ़ा हो, पर उसका सर्वहाराकारन लगातार हो रहा है! यह एक प्रक्रिया है, ध्रुव सत्य नहीं.
दिखता है फासीवाद का असली रूप. अमेरिका में ट्रंप का आना, फ़्रांस और यूरोप, युक्रेन में दक्षिणपंथीयों का काफी तेजी से बढ़ना, बढ़ते युद्द और 3सरी विश्व युद्ध की संभावना भी इसी का भयानक रूप है. आतंकवाद का ऐसा भयानक रूप पहले कभी नहीं दिखा. स्टीफेन हौकिन (अपन्ग, भौतिकशस्त्र के महानतम वैज्ञानिक) ने कहा है की मानवता को मशीनों से खतरा नहीं है बल्कि पूंजीवाद से है.
क्रन्तिकारी क्या करें?
जीहाँ, यह प्रश्न स्वाभाविक है. यहाँ यह सवाल प्रगतिशील ताकतों, युवकों और विद्यार्थियों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है! मजदुर वर्ग, किसानों के लिए अति जरुरी है.
आज की स्थिति का एक सही विश्लेषण, एक ऐतिहासिक सन्दर्भ में जरुरी है. बदलते हालात में विश्लेषण भी बदलेगा, क्रांति का रास्ता भी बदलेगा, कौन सा वर्ग किस वर्ग के साथ सम्बन्ध बनाएगा, यही विश्लेषण तय करेगा. एक सही वैज्ञानिक और क्रांतिकारी राजनितिक रास्ता तय होगा, जिसपर मद्जुर वर्ग की अगुवाइ में क्रांति सफल हो सकता है.
आज जरुरत है फासीवाद के विरुद्ध सर्वहारा वर्ग को प्रशिक्षित करना, उन्हें गोलबंद करना, हर फासीवादी चाल और कार्य का विरोध करना, वर्ग संघर्ष को तीव्र करना, राज्य सत्ता को हासिल करना, समाजवादी समाज स्थापित करना. यह स्पष्ट है, जो भी हमारे साथ आयें इस आन्दोलन में उन्हें भी हमारे लक्ष्य से रूबरू करवाएं. ध्यान रखें, कई धर्मनिरपेक्ष बुर्जुआ दल भी हमारे साथ आ सकते हैं पर उनका लक्ष्य पूंजीवादी समाज ही है, पर अब हम वापस फासीवाद का आधार पूंजीवाद हरगिज नहीं लाना चाहते, बल्कि इस दानव को, जो मेहनतकाश जनता के खून और पसीने पर फलता फूलता है, हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म करना चाहते हैं!
मजदुर दिवस पर सभी क्रांतिकारियों, मद्जुरों, किसानों को क्रन्तिकारी अभिनन्दन!

RUSSIAN SUPPORT FOR VLADIMIR LENIN PEAKS AHEAD OF BOLSHEVIK REVOLUTION CENTENNIAL

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http://www.newsweek.com/lenin-support-peaks-russian-revolution-bolshevik-centennial-586201

Earlier we had many such news on resurgent JV Stalin and even Karl Marx as one of the best seller, probably next to Bible. Now the world proletarian leader Lenin!
Lenin will be remembered as an integral part of the great weapon of the exploited class, “Marxism Leninism”, even after capital is buried and communism is established.
Revolutionary salute to Comrade VI Lenin!

BSF Jawan Tej Bahadur Yadav Dismissed

Tej Bahadur Yadav, BSF soldier was in media for having uploaded video showing the poor quality of food being served to soldiers in forward areas. The poor quality was due corruption by the officers, who stole part of it for their own pockets and for their own families.
Further, there was complain by his wife that her husband was incommunicado! Now he is dismissed by BSF on some inquiry, which must be for being undisciplined for going to media.
The dismissed soldier is likely to go to Court, but what relief will he get is anyone’s guess.
The old mindset of Armed & Paramilitary Forces will uphold this order. Complain by Jawans will not be taken in positive manner. Some even may say that the departmental justice or “Redress of Grievances” should have been seeked.
Not only the substandard food but even the menial jobs by the soldiers, including household, kitchen, laundry works at officer’s residence is taken as right by those who want the feudal culture to continue!
You will see them supporting RSS agenda, even though badly backstabbed on OROP! Sycophancy is part of loyalty, without much difference.
The much needed change in our society is not possible by those political parties, organisations who want the ‘golden Indian culture’ to continue, though they are gladly & greedily taking commissions from their capitalist masters!
Need to demolish capitalist mode of production, which ‘needs’ and reproduces feudal culture!
The society is beyond the capability of changing itself through reforms. What we need is revolution.

2017 By-poll & AAP: An analysis & Lessons

BJP won Delhi’s Rajouri Garden seat in by poll, the result came on 13 April, 2017. Congress was second. Here last time winner Aam Aadmi Party last has lost its deposit ahead of key civic elections.
AAP government did not fare bad as far as the governance was concerned. Why did it lose? It did no better in Punjab also, Goa was a washout. The un-ceremonial removal of Yogendra Yadav, Prashant Bhushan and others has some effect, but in all these elections, Swaraj Abhiyan or Swaraj India did not fight elections, did not act as voted divider. But in forthcoming election, MCD, they are contending and I have seen many AAP’s ex volunteers, now on this side.
Some ex volunteers have cribbed high handedness of the middle rung leaders of AAP and rudeness. Top level leaders, in any case, are non-approachable, like in Congress, BJP, SP, BSP, DMK, AIADMK, TC, SS, MNS, PDP, etc!
Was AAP different than other bourgeois parties? It claimed that “Revolution has begun” and this slogan was also seen on many timelines on social media id of its volunteers, like Arvind Kejriwal’s Twitter account.
In 2014 election, the AAP leaders were very fond of explaining about revolution, the opportunity to carry out revolution or that the revolutionary flame only comes once in few decades and this flame does not wait for ever.
Now this talk is history, the talk of Swaraj, JLPB is over, the anti-corruption platform has evaporated. Now what is left over is its claim to work for the people, in education, health. The stunted Delhi Government (It is almost strangulated due BJP’s Central government and its puppet LG controlling Delhi police, administration and MCD, too, is under rule of BJP for last 8 years) could do nothing more than it. Example of Allende in Chile, where he and his party wanted to build a socialist society on the existing state machineries, is not known to most of the AAP members. Allende’s power was usurped by the bourgeois class with its existing pillars of the ‘democracy’ and he had to suicide!
What am I hinting at? I am talking of AAP’s economic, social, political policies. It was never revolutionary. As long as YY, PB were there as think tanks, there was some pro working class, peasants talk, and there was slogan of controlling the big capitalists, similar to that of Social Democrats. Like, “Those who work, shall eat”. However, must remember that, class was never discussed, like in 1977 movement, where JP talked of it, but upheld Class Reconciliation, rather struggle, to demolish the class in future society.
Arvind Kejriwal had clearly stated in a FICCI presentation that he is not against capitalism but against crony capitalism! Its lower level volunteers, till date, boast of favouring “no ism”, the century and half old ideology of Prudhon, “Anarchism”, as a brand new idea!!!
So, whatever vision AAP had or now has (though much shrunken now) is nothing but some reforms, not much different than the other bourgeois parties. As a new party, somehow, akin to AASU, had many honest leaders, volunteers and worked hard. Stagnation is natural. The demand and implementation of much higher pay & perks by its newly elected MLAs was part of this stagnation. And natural degeneration in capitalist culture and in a society divided into class, where everyone is ‘forced’ to try to rise the higher ladder, was part of AAP’s decay.
The continuous lies and misinformation by the RSS IT Hubs, by its paid trolls, too, had some effect, especially in Delhi, where the psychology of middle class philistines is ever vacillating. This time to become nationalist or for Hindu Rashtra, too had effect on the voters? May not be very true, as judging on fewer seats will be erroneous.
AAP, positively, failed to please and assure the elite class, the true rulers of the country, who could give Billions to it to win elections. Media could have been at its disposal. AAP’s policy here tactically and strategically failed and it remained face of middle class, pseudo intellectuals, that too in big cities and that of small traders, for whom it wanted to make the IT procedures simpler! This was a tragedy of a bourgeois party!
AAP was never for the proletarian class, the peasants and their government. Its only ideological work was Swaraj, written by Arvind Kejriwal. This book upholds the feudal ‘swaraj’ in British India and some in the foreign, like in Sweden! The petty bourgeois desire, vision is clearly visible in its manifesto and even in its work. Maintaining capitalism and in its shade giving right to the locals, at village, small towns, Kasbas level to take care of themselves with the aid given by the Central authorities!
It has no outlook on philosophy, except that it advocates love all religion. It’s leaders, like that of Congress, BJP, etc bow to the statue of Bhagat Singh on his martyrdom but never uphold or negate his revolutionary, Marxist ideology, never talk of his party HSRA!
Political outlook is change the country via parliamentary election. It did go to streets but now has been abundoned.
In short, AAP’s economic, philosophical, political ideology has nothing to offer a common man (Forget the working class, peasants and other exploited class, women) different than the other bourgeois class. The ‘tag’ of honesty was masked by its opportunism, where its leaders went after better facilities, pay, perks.
In the present or in the upcoming forth election, the results will be on similar line! What will happen, if AAP dose not fare well in MCD election. Will it remember Right to Recall, the main slogan of 1977 movement? Or will it boast, that from zero seats in the existing MCD, it has bagged so many seats? It has to say something, to keep its volunteers entertained, enthused, at least on social media, where it fights well against the paid trolls of RSS!
But sure enough, there will be no self-criticism, like any other bourgeois parties! Reformism, too, has its great moments, when millions of supporters come to the street but it vanishes equally fast! A fight above class is like Modi’s slogan “Sabka Saath Sabka Vikas (With everyone, progress for everyone). In case it does well, the “Revolution has begun” will be seen on its leader’s time-lines for longer time.
To conclude, I will only say that, India needs a party of the working class to lead resistance against the rising fascism in all walks of life, in all departments of, state on strictly class line. Its ideology must confirm to revolution; revolution, which could change the existing property relation, the capitalism, to establish socialism, the dream of Bhagat Singh and his comrades, that of HSRA. AAP might had seeds of revolution but was buried immediately after it came into existence.
Unity & struggle of the exploited against the exploiters cannot wait for long. The degeneration of present society, based on class division, wage slavery is beyond tolerance. The productive forces are being destroyed to maintain the hegemony of capital. It must come to an end. New society; with equality, new opportunity to all its members, 100% employment, women’s parity, free children’s education and health to everyone; will save the mankind, the environment and the mother Earth!

Save Mother Earth: Stop Production for Profit!

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Mother Earth has multifold problems. Overpopulation, global warming, environmental degradation, etc. All these problems are related to production by mankind for profit.
Production is necessary for the mankind to sustain itself, produce basic subsistence and modern gadgets to live with minimum manual work, diminishing working hours, so that it can use the leisure for entertainment, study, art, cultural and spiritual activities, travel, etc. This differentiates mankind from the animal kingdom. More the advanced science & technology, more the productivity, more the difference between between a man and an animal!
But, the profit, extraction of ‘Surplus Value’ from the working class by very few big capitalists has foiled the above objectives. In fact, this process has enslaved the mankind and the present right wing policies has further degraded the mankind to ensure divided working class and more and more profit for the master, the ruling class!
This profit (rate) and forced competitions among the bourgeois class to remain ahead of its competitors forces it to overlook the environmental degradation in mines, in factories, where the chemical and emission of poisonous gas, etc go unchecked. Deforestation and global warming is part of such production and services. Governments, whether under the control of the big capitalists or in hands in gloves with them, overlooks this process. Corruption takes birth and matures in these competitions.
So friends, whatever we, as individuals or in groups, or with the help of some NGOs do to save the mother Earth, we will fail. Solution is to stop production for profit and convert it into production for survival and use by the members of society.
In short, it means demolish Capitalism, replace it with Socialism. That will ensure not only 100% employment of the workers, peasants, eradicate illiteracy, ignorance, superstition but also end terrorism, war and finally save our mother Earth, probably the only known planet in the Universe, which sustains life!

CPM calls to fight communalisation of Bengal

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Secularism in Capitalism is on the mercy of bourgeois class. When in crisis, it uses its tested & tried weapons, like religion, nationalism, colour, etc!
The ground for this was maturing since long. Since early 1990s, Indian bourgeois class; in hands in gloves with the international finance capital & institutions IMF, World Bank; has been marching ahead! The working class leadership failed not only to see this, but helped it by allying with Congress, till the last Bengal election.
The base of communalism, fascism is capitalism, the advancing capital against the labour, for higher profit rate.
Class unity & struggle became alien for the leadership, as they had become used to easy lives, in & out of Parliament, air conditioned comforts, even though may had remained honest “legally”. Revolutionary programmes were replaced by revisionism!
New groups, organisations, parties upholding proletarian revolution are rising. Hope of the exploited is with them and the old is withering away in the cobweb of election, comfortable lives, revisionism, etc!
These rallies and appeals have become meaningless! By the way, TMC, under the leadership of Mamata Banerjee, too, is struggling against rising communalism & fascism! Congress has lost the ground to fight this monster, as it was the mother of it. Congress’s Neo-liberalism or reform is adopted 100% by the BJP government, only the mask has changed, with a slogan of Hindu Rashtra and Cow, Temple, Anti Muslim and in act, even anti Dalits, anti women!
Path to counter this ugly, militant henchmen is resistance on a single political line, which leads to Socialist Revolution!

Russian Nationalism is Anti People!

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The so called centre of anti imperialism! Today, there is rush, among middle class Russians, pseudo intellectuals, social democrats, renegade Trots, upholders of Kautsky & Tito and others to show their patriotism for the Father or Mother land Russia!
The Right Wing parasites are even glorifying Stalin, who as per them was symbol of Russian glory, of course without his ideology!!
This trend is Universal. Indian bourgeois parties garland Marxist Bhagat Singh, icon of revolution, without talking about his ideology on working class, atheism, socialism, his party HSRA!
Capitalism not only breeds unemployment, cyclic economic recession that destroys the productive forces, war but also the working class, which is destined to destroy it and usher Socialism.
Private property, the base of all evils today, must be buried in favour of social wealth to end all forms of exploitation of man by man!

“One of the most striking pictures from Sunday’s protests against corruption in Moscow was that of a girl in a white coat being carried away by several Russian police officers [before being taken to a nearby police van].”
https://themoscowtimes.com/news/and-then-i-suffered-in-her-own-words-olga-lozina-heroine-of-iconic-photo-from-moscow-protests-57544?utm_content=buffer10e53&utm_medium=social&utm_source=facebook.com&utm_campaign=buffer